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             "गैर" क्यों है गैरसैंण

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Reported by KNEWS

Updated: Mar 07-2019 05:50:43pm
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दशकों तक लाठी और गोली खाकर चले जनांदोलन के बाद आखिरकार 9 नवम्बर 2000 को पृथक उत्तराखंड राज्य का सपना साकार हुआ। उत्तरप्रदेश से अलग होकर पहाड़ी राज्य तो बना मगर उत्तराखंड गठन के 18 साल बाद आज भी पहाड़ की राजधानी पहाड़ में यानी गैरसैंण को बनाने का आंदोलनकारियों का सपना सिसक रहा है ।  इन 18 वर्षों  के दौरान आवाम ने कभी बीजेपी तो कभी कांग्रेस को सूबे की सत्ता का सरताज बनाया  मगर अफ़सोस  जनभावनाओं से जुड़े  गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने का सपना किसी भी पार्टी की सरकार ने साकार नहीं किया । दरअसल यह मामला तो उसी वक्त सुलझ गया होता  जब  2000 में उत्तराखंड ( तब उत्तरांचल ) का गठन हुआ था, उस वक्त देहरादून को अस्थाई राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया था। आज 18 बरस बीतने के बाद भी गैरसैंण गैर है और देहरादून अस्थाई राजधानी के रुतबे पर कायम है । इस दौरान साल 2000 में सूबे की पहली अंतरिम सरकार के तौर पर सत्ता का स्वाद चखने वाली बीजेपी ने राजधानी की खोज के नाम पर दीक्षित आयोग  बनाया, तकरीबन 1 दर्जन एक्सटेंशन के बाद आयोग जैसे तैसे आठ साल बाद 2008 में बीजेपी की तत्कालीन खंडूड़ी सरकार को सिफारिशें सौंपने में तो कामयाब रहा लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद सरकारी फाइलों में कैद यह रिपोर्ट बाहर निकाले जाने की बाट जोह रही है। दीक्षित आयोग ने स्थाई राजधानी के लिए पांच स्थानों देहरादून, गैरसैंण के आसपास का क्षेत्र, काशीपुर, रामनगर और ऋषिकेश के नाम पर गौर कर दावेदारी के मामले में गैरसैंण को कमजोर  करार दिया जबकि देहरादून को तमाम मानकों के आधार पर स्थाई राजधानी के लिए बढ़िया  बताया । यही वजह है कि आज तक हर  सरकार ने इस रिपोर्ट को ठन्डे बस्ते में ही डाले रहना मुनासिब समझा है ताकि वक्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए गैरसैंण को गरमाया जा सके। अपने नेताओं की फितरत को देखकर गैरसैंण भी यह कहने को मजबूर हो गया है " मैं पसंद तो सबको हूं बस उनकी ज़रूरत के वक्त पर "। काबिलेगौर है कि भले ही कांग्रेस और बीजेपी की सियासी सोच और सिद्धांत अलग अलग हों मगर गैरसैंण पर सूबे की सत्ता में रहते बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नीति और नज़रिया एक जैसा रहा है, दोनों ही दलों ने गैरसैंण पर बड़ी बड़ी ढींगे हांकने के अलावा कुछ नहीं किया । बीते 18 सालों के दौरान सरकार किसी भी पार्टी की रही हो मगर गैरसैंण को अंजाम तक पहुंचाने की हिम्मत कोई हुकूमत नहीं जुटा पाई, ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने का मुद्दा अब ऐसा मुद्दा बनकर रह गया है  जिसे सुलझाने में सियासी पार्टियों  की कोई दिलचस्पी नहीं है , उनकी दिलचस्पी तो स्थाई राजधानी के मसले को उलझाए रख आवाम को उल्लू बनाने में है। गैरसैंण को क्या स्थाई राजधानी बनाया जाएगा, स्थाई नहीं तो क्या फिर ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा गैरसैंण को दिया जाएगा, जनता पूछते पूछते थक गई, सरकारें आती रहीं जाती रहीं और जवाब के नाम पर जुगाड़ से काम चलाती रहीं। उत्तराखंड के वजूद में आने के बाद  नित्यानंद स्वामी, कोशियारी, एनडी, खंडूरी , निशंक फिर खंडूरी ने बारी बारी राज किया लेकिन गैरसैंण के भविष्य पर भ्रम बना रहा , फिर बारह साल बाद जब कांग्रेस 2012 में दूसरी बार सत्ता में आई तो गैरसैंण को लेकर उस वक्त कॉंग्रेसी रहे विजय बहुगुणा( अब भाजपाई)  की रहनुमाई वाली सरकार ने  ऐसी तेजी दिखाई  लगा कि मानों विजय का विजन स्थाई राजधानी के तौर पर गैरसैंण के अधूरे सपने को साकार करने का है । पहली बार किसी सरकार ने न केवल गैरसैंण में कैबिनेट बैठक की बल्कि मकर सक्रांति के दिन 14 जनवरी 2013 को भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन की नींव रखकर इतिहास रच दिया। हालांकि बहुगुणा का यह कदम भी गैरसैंण की गुत्थी को सुलझाने की ओर दिखाकर तारीफ़ पाने की तरकीब भर थी। उन दिनों सिंहासन के संग्राम में विजय से पराजित होने वाले हरीश रावत को मुआवजे के तौर पर केंद्र में कैबिनेट मंत्री एडजस्ट किया गया था, हरदा को दिल्ली लाकर देवभूमि से दूर करने की कोशिश की गई थी लेकिन हरदा कहाँ हार मानने वाले थे उन्होंने दिल्ली से बहुगुणा पर लगातार लेटर बम बरसाना शुरू किया ऐसे में हरदा और उनके शागिर्दों की बोलती बंद करने के लिए बहुगुणा को गैरसैंण का गेम खेलना पड़ा ।

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खैर 2013 में आये कुदरत के कहर से सूबे को उबारने में नाकाम रहने के चलते 2014 में बहुगुणा को सत्ता से रुखसत होना पड़ा अब इसपर बैठने की बारी थी सियासत के सयाने हरीश रावत की, रावत की रणनीति भी स्थाई राजधानी पर कुछ कर दिखाने की नहीं, दिखावा करने की ही रही। गैरसैंण में बनाये विधानसभा,  सचिवालय की इमारत से इतराने , सत्र आयोजित करने में ही हरदा हांफ गए। गैरसैंण की पोलिटिकल पिकनिक पर कभी कैबिनेट बैठक तो कभी विधानसभा सत्र का मुलम्मा चढ़ाकर  कांग्रेस की बहुगुणा और रावत की सरकारों ने  भी पिछली सरकारों की तर्ज पर स्थाई राजधानी के नाम पर आवाम की आँखों में धुल झोंकने का ही काम किया। 2017 में कांग्रेस सत्ता से रुखसत हुई और बीजेपी हुकूमत में आई । गैरसैंण पर बीजेपी की मौजूदा त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार खुद को गंभीर तो दिखाती है और ऐसी भी उम्मीद जगाती है कि शायद गैरसैंण स्थाई न सही ग्रीष्मकालीन राजधानी बन जाये लेकिन उनकी कैबिनेट के कोहिनूर और संगठन के सुप्रीमों ही गैरसैंण में सत्र के बहाने सरकार की संजीदगी  पर सवाल खड़े कर देते हैं।ऐसे में एक हल की ओर बढ़ते गैरसैंण की डगर फिर डगमगाती दिख रही है, आखिर 18 साल बाद भी गैरसैंण क्यों गैर बना हुआ है चलिए इसे समझने की कोशिश की जाए।

असल  में राज्य बनने के बाद पहाड़ के सियासतदानों  का देहरादून  में दिल ऐसा लगा कि गैरसैंण को गैर बनाये रखने के लिए उन्होंने अंदरखाने राजनितिक रंजिश को भी खूंटी पर टांग दिया । इसके अलावा एक बड़ी वजह और भी है और शायद यही सबसे बड़ी वजह भी है और वो है सीटों का समीकरण। गैरसैंण को स्थाई राजधानी न बनाए जाने के पीछे सियासी पार्टियों के मन में बैठा एक डर है जो उन्हें इस मसले पर मजबूत फैसला लेने नहीं देता और यह डर है  विधानसभा सीटों का गणित गड़बड़ाने का । दरअसल  2007-08 में हुए विधानसभा सीटों के नए परिसीमन के बाद सूबे की कुल 70 में से ज्यादातर सीटों की शक्ल ही बदल गई , इससे अधिकांश सीटें मैदानी - तराई  इलाकों में चली गईं। कुल विधानसभा सीटों की लगभग आधी सीटें मैदानी क्षेत्र में हैं और यही वह वजह है, जिससे कांग्रेस हो या बीजेपी  गैरसैंण की खुलकर हिमायत की हिम्मत नहीं जुटा पाती हैं। दोनों पार्टियों को यह डर लगता है कि अगर उन्होंने गैरसैंण जैसे पहाड़ी  इलाके में  स्थाई राजधानी को लेकर ज्यादा जोश दिखा दिया तो मैदानी इलाकों की 35 विधानसभा सीटों का वोटर अपने हंटर से उनके इस जोश का जूस निकाल सकता है , रही बात  पर्वतीय क्षेत्र की 35 विधानसभा सीटों की तो यहां  पिछले 18  सालों से मतदाता को झांसा देकर ये दोनों पार्टियां पटाती आ रही हैं । दोनों पार्टियां इसलिए भी बेफिक्र हैं क्योंकि अब तक के चार चुनावों में पहाड़ की भोली जनता ने अपने जज्बात से खिलवाड़ करने वालों को कोई सबक नहीं सिखाया है। ऐसे में बड़ा सवाल यही  कि क्या सियासी गणित में उलझी गैरसैण की गुत्थी कभी सुलझेगी ? आवाम के सरोकार पर जिस तरह सत्ता का स्वार्थ हावी है उसे देख यह समझना मुशिकल नहीं कि जनता गैरसैंण के सपने को साकार होने का इंतज़ार करती रहेगी और सियासतदां उनके इस सपने पर सियासत करते रहेंगे |