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पैतृक संपत्ति मामले में बदलाव, शीर्ष अदालत ने पलटा हाई कोर्ट का फैसला

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Reported by KNEWS

Updated: Feb 03-2018 09:05:44am

नई दिल्ली : केन्द्र सरकार ने वर्ष 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में संसोधन किया था। इसके बाद पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हक देने की व्यवस्था की गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि ये कानून सभी महिलाओ पर लागू होता है, भले ही उनका जन्म साल 2005 से पहले ही क्यों न हुआ हो। इस मामले पर जस्टिस अशोक भूषण की बैंच का कहना है कि संसोधित कानून ये गारंटी नही देता कि बेटी जन्म से ही साझीदार होगी और उसके भी उसी तरह के अधिकार और उत्तरदायित्व होंगे जैसे एक बेटे का होता है।

 

इसके अलावा बैंच ने ये भी कहा कि पैतृक संपत्ति में हिस्सा देने से बेटियों को इनकार नहीं किया जा सकता कि उसका जन्म साल 2005 से पहले हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पषट रूप से कहा कि हिंदू उत्तराधिकार कानून वर्ष 2005 के पहले दायर और कानून बनने के बाद लंबित संपत्ति से जुड़े सभी मामलों पर लागू होता है। बैंच  का कहना है कि संयुक्त हिंदू  परिवार से जुड़े कानून का संचालन मिकाक्षरा कानून 
से होता है।

 

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क्या है मिताक्षरा कानून :-

मिताक्षरा पूर्वजों की संपत्ति में पिता और पुत्र का समानाधिकार मानती है अतः पुत्र पिता के जीते हुए भी जब चाहे पैतृक संपत्ति में हिस्सा बँटा सकते हैं और पिता पुत्रों की सम्मति के बिना पैतृक संपत्ति के किसी अंश का दान, विक्रय आदि नहीं कर सकता। पिता के मरने पर पुत्र जो पैतृक संपत्ति का अधिकारी होता है वह हिस्सेदार के रूप में हाता है, उत्तराधिकारी के रूप में नहीं। मिताक्षरा पुत्र का उत्तराधिकार केवल पिता की निज की पैदा की हुई संपत्ति में मानती है। दायभाग पूर्वपस्वामी के स्वत्वविनाश (मृत, पतित या संन्यासी होने के कारण) के उपरांत उत्तराधिकारियों के स्वत्व की उत्पत्ति मानता है।

 

उसके अनुसार जब तक पिता जीवित है तब तक पैतृक संपत्ति पर उसका पूर अधिकार है, वह उसे जो चाहे सो कर सकता है। पुत्रों के स्वत्व की उत्पत्ति पिता के मरने आदि पर ही होती है। पहले की तुलना में काफी बदलाव हुआ है। बैंच के अनुसार ये बदलाव नजदीकी पारिवारिक सदस्यों विशेषकर समाज में समान अधिकार देने की बढ़ती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया गया है। बैंच ने ये भी कहा कि इस मामले में समाज में बेटियों को बराबर का हक दिलाने के लिए कानून में बदलाव किया गया था। दरसल ये मामला वर्ष 2002 का है जब पिता की संपत्ति में बेटियों ने हिस्से की मांग की थी और भाईयों द्वारा उन्हे ये कहकर इनकार कर दिया गया था कि इसमें इनका कोई हिस्सा नही है।

 

इसी मामले में दो बहनों ने निचली अदालत में याचिका दायर की कि इन्हे अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा चाहिये। जहां इनको इंसाफ नही मिला फिर दोनो ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया इनको उम्मीद थी कि शायद उच्च न्यायालय में इनके हक में फैसला आयेगा लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि आपका जन्म 2005 से पहले हुआ है जिस कारण से आपको पैतृक संपत्ति में हिस्सा नही मिल सकता। बहनों की सारी उम्मीदें टूट गई। लेकिन देश की सबसे शीर्ष अदालत में इसका फैसला अभी बाकि था याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

 

उनकी ये आखिरी उम्मीद थी कि उनको यहां न्याय जरुर मिलेगा। न्याय की आस में सुप्रीम कोर्ट पहुंची दोनो बहनों ने यहां पर याचिका की। जहां उनकी जीत हुई कोर्ट ने बहनों के हक में फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और कहा कि जिन लड़कियों का जन्म वर्ष 2005 से पहले हुआ है वो पिता की संपत्ति में हिस्सेदार है।
कोर्ट के इस फैसले से लाखों लोगो के चेहरे पर खुशी थी।